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Thursday, August 26, 2010

ek bar phir.

सपनों को आने दो
नये घरौंदे बनने दो
इन्ही घरौंदों में कुछ अपना
ज्यादा तो है तेरा सपना.
इन सपनों को आने दो .......
जब तक सपने नहीं दीखते
लक्छ्य नहीं हैं तब तक मिलते
ल्क्च्या बिन्दुओं को पाने को
 इन सपनों को आने दो .

Monday, August 16, 2010

bhav bhoomi ke naye prasth par

भाव भूमि के नए प्रष्ठ  पर नूतन कविता लिखता हूँ .
नई तूलिका नए रंग से नया चित्र फिर गढ़ता  हूँ .
तिरसठवां ये नया प्रष्ठ है भारत की आजादी का
भ्रस्टाचार का शीर्षक दे दूँ महंगाई बर्बादी का
सड़क नरेगा सिक्छा सबको चारों तरफ झुनझुना बजता
अस्पताल के द्वार पे budhiya तिल तिल कर रोज है मरता
छोटे से बुखार के बदले कैंसर का इलाज होता है
छोटा डाक्टर अपने को कैंसर का विज्ञ लिखता है.
छात्रा से विद्यालय मे बलात्कार का चलन हो रहा
आतंकवाद नक्सल हिंसा पर मुन्त्री गन का मनन हो रहा.
धर्म जाति की राजनीति पर मूल्ल्यों का हनन हो रहा
आजादी के पावन दिन पर थोड़ी कटुता कहता हूँ
भाव भूमि के नये प्रष्ठ पर नूतन कविता लिखता हूँ .
विष्णु कान्त मिश्र

Saturday, August 14, 2010

swatantrta divs abhinandan

शौर्य सन्ति prem की उमंग में जो लहराए ऐसे तीन रंग के तिरंगे है तुमेह प्रणाम.

हिन्दू सिख मुस्लिम है तेरी सभी संताने करते नमन और करते तुमहे सलाम .
दिलों जां भी देकर के रक्छा करेंगे तेरी  अहद आज करते हैं देते हम सभी बयां ..

Tuesday, June 15, 2010

hanuman jayanti.

 जेस्थ  का बड़ा मंगल  उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में  बड़े मंगल के रूप में मनाया जाता है . कदाचित सम्पूर्ण भारत में इसे उत्सव के जिस रूप में मनाये जाने की आल्हादकारी परम्परा लखनऊ में देखी जाती है जन मन के भावो को प्रतिबिंबित करते इस स्वरूप को हम प्रणाम करते है.  लखनऊ की हर गर्लिवों, सरकों, मोहल्लों तथा मंदिरों  में कही प्यासों को मठ सरबत पिलाया जा रहा है तो कही पुरियां और नुक्तियों का भोज बनता जा रहा है . कही कही तो बड़े बड़े पकवानों  का भी वितरण हो रहा है.  पिछले मंगल को किये गए एक सर्वे के अनुशार  लखनऊ में इस प्रकार के छोटे बड़े इस्तालों की संख्या  जो ज्येस्ठ  के बड़े मंगल पर लगते है वह लगभग  ३८७६  है . यह संख्या केवल लखनऊ नगर की ही है इसमें  बक्षी का तलब और इतौन्जा , काकोरी  की संख्य शामिल नहीं है . इन स्टालों पर बिना किशी भेद भाव हर  वर्ग ,समुदाय, जाति, धर्म  को प्रदान की जाति है . इन स्टालों पर  प्रसासनिक अधिकारी, नेता रिक्शा चालक  मजदूर सभी जाना और प्रसाद लेना पसंद करते हैं  . यह प्रसाद प्रभु बजरंग बली के जन्म दिवस पर वितरित होता है .  यह परम्परा  मुस्लिम बद्षाओं के समय से चली आ रही है .  वाजिदअली शाह  के समय से चली आ रही है . प्रारंभ उशी ने किया था.   इस अवसर  पर  काव्य पुष्प की  एक पंखुरी    राम भक्त हनुमान को समर्पित है.....
                         भय मुक्त करे जो समाज को
                         दीं हीन का उद्धार करे
                         ऐसे हनुमान  को बार बार
                         ही हम पुकार करें.

Thursday, June 10, 2010

aspandan

अस्पन्दन  क्रंदन है मेरा भाव भूमि की भाषा में .
तिमिर संजोयें हमने केवल कुछ पाने की आशा में .
प्राप्ति कठिन kuch   सुलभ  है देना जो भी मेरे  पास धरा है.
अस्म्रितियों    पर नहीं दे शकूं मिलने की प्रत्याशा में.                                    

Monday, May 31, 2010

तुम्हारी प्रीति के अक्छर हमारे ह्रदय पटपर
अंकित है एक शिलालेख की तरह
इन अक्छरों को उकेरने की पीड़ा का उपहार
संजोया है हमने  एक धरोहर की मानिंद
जिसकी हिफाजत  में बिताये पल
देते हैं हमे एक अनुपम आनंद
इन अक्छ्रोयुए को प्रणाम .

Tuesday, May 25, 2010

उनको जो नहीं है मेरे साथ

भाव आते रहे भाव जाते रहे ,
हम तुम्हारे बिना क्यों यहाँ रह गए ।
करता निर्माण हूँ इक घरौंदे का फिर ,
ईट गार्रों में आंसू भी है मिल गए।
सोचता हूँ की दीवार वह कौन सी ,
स्वप्न जिसमे tumhaarey धरे रह गए ।
खंड भू का तुम्हरा है अन्दर मेरे ,
चित्र जिस पर तुम्हारे बने रह गए।
गृह के हर द्वार में बजके पायल तेरी ,
मेरे कानो में स्वर गूंजते रह गये .
यह तुम्हारा तुम्ही को समर्पित प्रिये ,
कल्पना लोक में स्वप्न सजते रहे ।
होगा पूरा नहीं यह तुम्हारे बिना ,
मेरे साथी बताओ कहाँ तुम गए ।
आना होगा माये जब भी बुलाऊं तुम्हे ,
तार वीणा के उर में सजाते रहे.