प्रेम लिखा मनुहार लिखा अरु ब्याप्त अनीति पे वार किया ,
प्रीति कि रीति के दर्द भरी शब्दों कि परिधि को पार किया ,
कुछ भी तो कहो मेरे साथी गणों इस पन्ने पे अपनी राइ लिको
ब्लॉगर के हितैषी पाठकों से अनुरोध ये बारम्बार किया.
अरुणेश जो ब्लॉगर के हैं धनी अनुकम्पा कभी कभी करते रहे .
भाव की गाड़ी रुकी जो कभी हवा उसमे सदा ही भरते रहे.
ब्लॉगर की बिरादरी के वाहक उनसे ही हमे अस्थान मिला
अब बाट निहारूं उनकी यहाँ प्रभु से यही बिनती करते रहे.
कुछ और भी ब्लॉगर बन्धु करे अनुशरण हमारा आज यहाँ
उनकी सदाशयता की उर्जा इस लोक हितों को समर्पित हो
अनुकम्पा मिले स्पंदन को मन भाव ह्रदय का प्रफुल्लित हो .
jo bhi kuch likhta hoon ' ushey samarpit karta hoon. apna bhi mantabya likhen kuch yehi prarthna karta hoon.
Tuesday, January 18, 2011
Monday, January 10, 2011
aawahn
कवि ! लिखो कदाचित कुछ ऐसा -----
मन जिससे हर्षित हो जाये .
वाणी बने प्रेरणा सबकी ,
जन गन मन पुलकित हो जाये .
"धनिया"की पीड़ा भी दूर हो ,
होरी सब का मन बसिया हो .
बसुधैव कुटुम्बकम की धरती '
मानव मन की शुचि बगिया हो .
नैतिकता संकल्प बने
पथ भ्रष्ट निराश्रित हो जाये
साहित्य भरे जन मांस में
सरोकार सब मिल जाएँ ...
यह कविता नहीं है यह मेरा सभी साहित्यकारों ब्लॉगर लिखने वालों से अनुरोध है... हम सभी को आज के भ्रस्ताचार के बिरुद्ध खड़े हो जाना चाहिए. जय हिंद.
मन जिससे हर्षित हो जाये .
वाणी बने प्रेरणा सबकी ,
जन गन मन पुलकित हो जाये .
"धनिया"की पीड़ा भी दूर हो ,
होरी सब का मन बसिया हो .
बसुधैव कुटुम्बकम की धरती '
मानव मन की शुचि बगिया हो .
नैतिकता संकल्प बने
पथ भ्रष्ट निराश्रित हो जाये
साहित्य भरे जन मांस में
सरोकार सब मिल जाएँ ...
यह कविता नहीं है यह मेरा सभी साहित्यकारों ब्लॉगर लिखने वालों से अनुरोध है... हम सभी को आज के भ्रस्ताचार के बिरुद्ध खड़े हो जाना चाहिए. जय हिंद.
shahity banam samaj
ब्यथा प्रस्फुटित जब होती है
वाणी में बहकर झरती है .
पीर स्वयम की हो या पराई ,
जब शब्दों में कुछ कहती है .
निर्झर प्रवाह कविता बनकर ,
चट्टानों से तब लडती है.
"मैं" बनकर जब "हम" होता है ,
बात तुम्हारी तब कहती है..
वाणी में बहकर झरती है .
पीर स्वयम की हो या पराई ,
जब शब्दों में कुछ कहती है .
निर्झर प्रवाह कविता बनकर ,
चट्टानों से तब लडती है.
"मैं" बनकर जब "हम" होता है ,
बात तुम्हारी तब कहती है..
Friday, December 31, 2010
Friday, December 17, 2010
ab tk aaj 10-30 am
स....... आज भी रोज की तरह उठा हूँ ...थोडा अलसाया था..आज ब्यायाम कुछ ज्यादा ही किया है ...नहाने धोनी के बाद रोज की ही तरह पूजा कर भगवान को याद करने का ढोंग किया है . ढोंग ही कह सकते हैं क्योकि मन तो असांत रहता है . मेरा नौकर गैस लेने गया है भूखा तो नहीं कह सकता परन्तु एक कप चाय से पेट के अंदर कूदते चूहे मानने वाले नहीं हैं. बेटी कालेज जा चुकी है. ------बस बेटा ब्लॉग लिखते रहो...मेरी पत्नी जब जीवित थी तब कहा करती थी की मेरे न होने पर पता चलेगा.. सही था..विकल्प खोजने में परिवार की इतनी वर्जनाएं हैं की उसे अमली जमा पहनने में बहुत झंझट हैं
Thursday, December 16, 2010
भारती के भाव विह्वल आंसुओ की याचना है
तुम कलम से विरह के अब गीत लिखना छोड़ दो
हास्य की यह रितु नही है एक केवल कामना है ,
तुम चरण चारण की अपनी बात करना छोड़ दो.
भ्रष्ट होते तन्त्र की ब्यथा पर अब कुछ लिखो ,
दर्द से होती तड़प की वेदना पर कुछ लिखो ,
चीर खोती द्रोपदी की नग्नता पर कुछ लिखो..
आतंक भ्रस्टाचार की इन गठरियों को खोल दो..
तुम कलम से विरह के अब गीत लिखना छोड़ दो
हास्य की यह रितु नही है एक केवल कामना है ,
तुम चरण चारण की अपनी बात करना छोड़ दो.
भ्रष्ट होते तन्त्र की ब्यथा पर अब कुछ लिखो ,
दर्द से होती तड़प की वेदना पर कुछ लिखो ,
चीर खोती द्रोपदी की नग्नता पर कुछ लिखो..
आतंक भ्रस्टाचार की इन गठरियों को खोल दो..
Tuesday, December 14, 2010
tmanna..
तमन्ना कैसे करिये मंजिलों की , हो जब पैरों में बेडी मरहलों की .
मोहब्बत अपनी भी परवान चढ़ती , कमी शायद थी हममे हौसलों की .
जमी ज्यों ज्यों सिमटती जा रही है लकीरें बढ़ रही हैं फासलों की .
हमेशा सींचती रहती है कांटे सियासत बात करती है गुलों की .
अदालत जब हो मरहूने सियासत कहाँ तक कद्र कीजे फैसलों की .
जुनूं फिर आजिमे दस्ते सफर है इलाही लाज रखना आंवलों की
सिफ़ा होगी हटो ए चारा साजों हवा आने दो माँ के आंचलो की .
मोहब्बत अपनी भी परवान चढ़ती , कमी शायद थी हममे हौसलों की .
जमी ज्यों ज्यों सिमटती जा रही है लकीरें बढ़ रही हैं फासलों की .
हमेशा सींचती रहती है कांटे सियासत बात करती है गुलों की .
अदालत जब हो मरहूने सियासत कहाँ तक कद्र कीजे फैसलों की .
जुनूं फिर आजिमे दस्ते सफर है इलाही लाज रखना आंवलों की
सिफ़ा होगी हटो ए चारा साजों हवा आने दो माँ के आंचलो की .
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