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Wednesday, May 19, 2010

अपने अपने पल

छड़ो को युगों में बदलते देखा
पर नहीं बदला तुम्हारा रूप
तुम तब भी थे याचक और आज भी
तुम्हे बस मांगते पता हूँ .....
तुमने कभी तीन पग धरती मांग ली
कभी तुमने माँगा किसी माँ से उसके बेटे का कफ़न ।
तुम्हरे मांगने के प्रयोजन भी थे विचित्र ,'
कभी तुमने जो भी माँगा परिक्च्चा के नाम पर
अथवा माँगा दाता को उसे सुधारने के नाम पर .....
यह मांगना कितना ही इस्स्व्रीय हो ॥
लेकिन दाता के लिए हमेसा यह बहुत भरी पड़ा...
तुम हमें छद्म से दूर रहेने की सिक्चा देते आये हो
फिर क्या किये इतने सारे छद्म ....
प्रभु होने के मुखौटे तुम्हारी ही तरह येह बहुत से सत्ताधारी भी लगते है
वह भी लेने लगे है हमारा इम्तिहान ....अभी इन इम्तिहानो पर बगावत होना बाकि है।
बाकि है ।
अब मेरे प्रभु तुम कम से कम हमारा और कोई इम्तिहान न लो।
न लो .....बस.
विष्णु कान्त मिश्र।

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